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वृश्चिक राशिफल आज का — चंद्र राशि वृश्चिक

वृश्चिक राशिफल — 210° से 240° निरयन तक की चंद्र राशि। मंगल स्वामी, चंद्रमा 3 अंश पर नीच। विशाखा, अनुराधा और ज्येष्ठा के पाद सहित।

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वृश्चिक राशिफल उनके लिए है जिनका चंद्रमा जन्म के समय 210° से 240° निरयन के बीच था। वृश्चिक का स्वामी मंगल है और चंद्रमा स्वयं यहाँ 3 अंश पर नीच का होता है — यह एकमात्र राशि है जिसमें मन का कारक अपने निम्नतम बिंदु पर बैठता है।

राशि स्वामी
मंगल
तत्व
जल
निरयन विस्तार
210°00′ – 240°00′

यह तथ्य वृश्चिक चंद्र की पूरी व्याख्या का आधार है, और इसे दुर्भाग्य समझना भूल है। चंद्रमा का नीच होना मन के दुर्बल होने का नहीं, मन के असंतुष्ट रहने का संकेत है — जो मिला है वह पर्याप्त नहीं लगता, इसलिए खोज रुकती नहीं। वृश्चिक की प्रसिद्ध गहराई इसी असंतोष से बनती है, किसी रहस्यमय गुण से नहीं।

वृश्चिक स्थिर राशि है और जल तत्व की, इसलिए नवांश क्रम नवें स्थान से आरंभ होता है — कर्क से। वृश्चिक के नौ पाद नवांश में कर्क से आरंभ होकर मीन पर समाप्त होते हैं, अर्थात् जल से आरंभ और जल पर अंत। नीच का चंद्रमा और पूर्ण जल-नवांश — यही संयोजन वृश्चिक को भावनात्मक रूप से सबसे सघन राशि बनाता है।

वृश्चिक में अनुराधा पूरी आती है और उसका स्वामी शनि है। मंगल की राशि में शनि का नक्षत्र — दो सर्वाधिक कठोर ग्रहों का यह मेल वृश्चिक के मध्य चार पादों में बनता है, और शास्त्र में अनुराधा को मित्रता और निष्ठा का नक्षत्र कहा गया है। कठोरता और निष्ठा का यह संयोजन वृश्चिक के अतिरिक्त कहीं इस रूप में नहीं आता।

इस राशि के नौ पाद — नक्षत्र, अंश और नवांश

नक्षत्र पाद सायन अंश नक्षत्र स्वामी नवांश
विशाखा4210°00′ – 213°20′गुरुकर्क
अनुराधा1213°20′ – 216°40′शनिसिंह
अनुराधा2216°40′ – 220°00′शनिकन्या
अनुराधा3220°00′ – 223°20′शनितुला
अनुराधा4223°20′ – 226°40′शनिवृश्चिक
ज्येष्ठा1226°40′ – 230°00′बुधधनु
ज्येष्ठा2230°00′ – 233°20′बुधमकर
ज्येष्ठा3233°20′ – 236°40′बुधकुम्भ
ज्येष्ठा4236°40′ – 240°00′बुधमीन

इस राशि से बारह भाव — राशि और भावेश

भाव राशि राशि स्वामी किसका भाव
1वृश्चिकमंगलतन, स्वभाव, देह
2धनुगुरुधन, कुटुम्ब, वाणी
3मकरशनिपराक्रम, भाई-बहन, साहस
4कुम्भशनिसुख, माता, घर
5मीनगुरुविद्या, संतान, बुद्धि
6मेषमंगलरोग, ऋण, शत्रु
7वृषभशुक्रदाम्पत्य, साझेदारी
8मिथुनबुधआयु, गुप्त, आकस्मिक
9कर्कचंद्रभाग्य, धर्म, पिता
10सिंहसूर्यकर्म, प्रतिष्ठा
11कन्याबुधलाभ, इच्छा-पूर्ति
12तुलाशुक्रव्यय, विदेश, मोक्ष

किस ग्रह के पास कौन-से भाव

ग्रहभाव
सूर्य10
चंद्र9
मंगल1 · 6
बुध8 · 11
गुरु2 · 5
शुक्र7 · 12
शनि3 · 4

वृश्चिक से द्वितीय और पंचम दोनों गुरु के पास हैं — धन और संतान-बुद्धि एक ही स्वामी के। शनि के पास तृतीय और चतुर्थ, यानी पराक्रम और सुख; मंगल स्वयं लग्न और षष्ठ का स्वामी है, इसलिए वृश्चिक चंद्र के लिए स्वभाव और संघर्ष एक ही ग्रह से पढ़े जाते हैं। वृश्चिक में कोई योगकारक ग्रह नहीं है।

वृश्चिक में चंद्रमा 3 अंश पर नीच होता है, और वह बिंदु विशाखा के चौथे पाद में पड़ता है — पाद स्वामी गुरु। यह इस पृष्ठ की सबसे भारी बात है और इसे सीधे कहना ही ठीक है: जिस राशि का यह राशिफल है, उसी में मन का कारक अपने तल पर बैठता है। इसका अर्थ दुर्भाग्य नहीं; इसका अर्थ यह है कि वृश्चिक चंद्र को स्थिरता जन्म से नहीं मिलती, बनानी पड़ती है।

वृश्चिक के आठ पाद दो लंबी दशाओं में बँटे हैं — अनुराधा के चार शनि की उन्नीस वर्ष की, ज्येष्ठा के चार बुध की सत्रह वर्ष की। विशाखा का बचा हुआ एक पाद ही गुरु की दशा देता है, और वही सबसे कम मिलता है। कर्क और मीन का क्रम भी यही है।

इस राशि के नक्षत्र — गण, योनि और नाड़ी

नक्षत्र नक्षत्र स्वामी गण योनि नाड़ी
विशाखागुरुराक्षसव्याघ्रअन्त्य
अनुराधाशनिदेवमृगमध्य
ज्येष्ठाबुधराक्षसमृगआदि

इस राशि में किस ग्रह का उच्च या नीच

ग्रह स्थिति राशि में अंश कौन-से पाद में
चंद्रनीच3°00′विशाखा पाद 4 · गुरु

इस राशि में जन्म से कौन-सी महादशा पहले चलती है

नक्षत्र नक्षत्र स्वामी महादशा वर्ष राशि का भाग
विशाखागुरु16 वर्ष1/9 · 3°20′
अनुराधाशनि19 वर्ष4/9 · 13°20′
ज्येष्ठाबुध17 वर्ष4/9 · 13°20′

यही तीन आरंभिक महादशाएँ इन राशियों को भी मिलती हैं: कर्क · मीन

कार्य और करियर

मंगल — राशि स्वामी

मंगल यहाँ जल राशि में है, इसलिए उसकी ऊर्जा बाहर नहीं, भीतर चलती है। वृश्चिक चंद्र उस काम में असाधारण है जिसमें खोज हो — कारण ढूँढ़ना, दोष पकड़ना, सतह के नीचे देखना — और उस काम में ऊबता है जो पूरी तरह प्रकट हो।

धन और व्यय

गुरु — वृश्चिक से द्वितीयेश (धनु)

वृश्चिक से दूसरा भाव धनु है, गुरु का। धन-भाव पर सबसे शुभ ग्रह का स्वामित्व होने से संकट के समय सहायता प्रायः मिल जाती है; कठिनाई संचय की नहीं, विश्वास करके दिए गए धन की होती है।

संबंध

शुक्र — वृश्चिक से सप्तमेश (वृषभ)

वृश्चिक से सातवाँ भाव वृषभ है, जहाँ चंद्रमा उच्च का होता है। जिस राशि में मन नीच का है उसके ठीक सामने वह उच्च का है — इसलिए वृश्चिक चंद्र संबंध में स्थिरता खोजता है, और जब मिल जाए तो सबसे निष्ठावान रहता है।

स्वास्थ्य

मंगल और वृश्चिक का गुह्य-स्थान

कालपुरुष में वृश्चिक उत्सर्जन और प्रजनन तंत्र का स्थान है। वृश्चिक चंद्र में दबा हुआ भाव शरीर में रुककर बैठता है — यही कारण है कि इस राशि के लिए भावनाओं को व्यक्त करना स्वास्थ्य का प्रश्न है, स्वभाव का नहीं।

यह पृष्ठ आपको क्या नहीं बता सकता

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वृश्चिक में चंद्रमा नीच का होना बुरा है?

नहीं, यह असंतोष का संकेत है, अभाव का नहीं। शास्त्र में नीच भंग के कई योग बताए गए हैं, और नीच का चंद्रमा प्रायः असाधारण गहराई और सहनशक्ति देता है। किस रूप में फल मिलेगा, यह भाव-स्थिति से तय होता है।

वृश्चिक राशि में कौन से नक्षत्र आते हैं?

विशाखा का चौथा पाद, अनुराधा के चारों पाद, और ज्येष्ठा के चारों पाद — कुल नौ। विशाखा के पहले तीन पाद तुला में हैं, इसलिए विशाखा में जन्मे सब लोग एक राशि के नहीं होते।

क्या वृश्चिक का स्वामी मंगल है या केतु?

शास्त्रीय स्वामी मंगल है। कुछ परंपराएँ केतु को वृश्चिक का सह-स्वामी मानती हैं, जैसे कुम्भ के लिए राहु को — पर पराशर पद्धति की मूल गणना मंगल से ही चलती है।

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