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कर्क राशिफल — 90° से 120° निरयन तक की चंद्र राशि। चंद्रमा स्वामी, गुरु 5 अंश पर उच्च, मंगल 28 अंश पर नीच। पुनर्वसु, पुष्य और आश्लेषा सहित।
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कर्क राशिफल उनके लिए है जिनका चंद्रमा जन्म के समय 90° से 120° निरयन के बीच था। कर्क का स्वामी स्वयं चंद्रमा है, गुरु यहाँ 5 अंश पर उच्च का होता है और मंगल 28 अंश पर नीच का — यह एकमात्र राशि है जहाँ मन का कारक अपने ही घर में बैठता है।
कर्क चंद्र की मूल बात यही है कि यहाँ चंद्रमा स्वगृही है। जिस ग्रह की राशि हो उसी का उस राशि में होना बल देता है, पर चंद्रमा के लिए इसका अर्थ विशेष है: मन अपने ही घर में है, इसलिए वह अनुभव को छानता नहीं, सीधे भीतर ले लेता है। कर्क चंद्र की संवेदनशीलता कमज़ोरी नहीं, बिना फ़िल्टर की ग्रहणशीलता है।
कर्क चर राशि है और जल तत्व की, इसलिए नवांश क्रम स्वयं कर्क से आरंभ होता है और मीन पर समाप्त — जल से आरंभ, जल पर अंत। बारह राशियों में यह पूर्ण जल-वृत्त केवल कर्क को मिला है, और शास्त्र में कर्क की गहराई का यही गणितीय आधार है।
गुरु का कर्क में उच्च होना और मंगल का नीच होना एक साथ पढ़ना चाहिए। जो ग्रह कर्क में अपने शिखर पर है वह विस्तार, श्रद्धा और संरक्षण का कारक है; जो नीच का है वह आक्रमण और विच्छेद का। कर्क चंद्र का स्वभाव इसी असंतुलन से बनता है — जोड़ना सहज, काटना कठिन, और अधिकांश कठिनाई वहीं से आती है जहाँ काटना आवश्यक था।
| नक्षत्र | पाद | सायन अंश | नक्षत्र स्वामी | नवांश |
|---|---|---|---|---|
| पुनर्वसु | 4 | 90°00′ – 93°20′ | गुरु | कर्क |
| पुष्य | 1 | 93°20′ – 96°40′ | शनि | सिंह |
| पुष्य | 2 | 96°40′ – 100°00′ | शनि | कन्या |
| पुष्य | 3 | 100°00′ – 103°20′ | शनि | तुला |
| पुष्य | 4 | 103°20′ – 106°40′ | शनि | वृश्चिक |
| आश्लेषा | 1 | 106°40′ – 110°00′ | बुध | धनु |
| आश्लेषा | 2 | 110°00′ – 113°20′ | बुध | मकर |
| आश्लेषा | 3 | 113°20′ – 116°40′ | बुध | कुम्भ |
| आश्लेषा | 4 | 116°40′ – 120°00′ | बुध | मीन |
| भाव | राशि | राशि स्वामी | किसका भाव |
|---|---|---|---|
| 1 | कर्क | चंद्र | तन, स्वभाव, देह |
| 2 | सिंह | सूर्य | धन, कुटुम्ब, वाणी |
| 3 | कन्या | बुध | पराक्रम, भाई-बहन, साहस |
| 4 | तुला | शुक्र | सुख, माता, घर |
| 5 | वृश्चिक | मंगल | विद्या, संतान, बुद्धि |
| 6 | धनु | गुरु | रोग, ऋण, शत्रु |
| 7 | मकर | शनि | दाम्पत्य, साझेदारी |
| 8 | कुम्भ | शनि | आयु, गुप्त, आकस्मिक |
| 9 | मीन | गुरु | भाग्य, धर्म, पिता |
| 10 | मेष | मंगल | कर्म, प्रतिष्ठा |
| 11 | वृषभ | शुक्र | लाभ, इच्छा-पूर्ति |
| 12 | मिथुन | बुध | व्यय, विदेश, मोक्ष |
| ग्रह | भाव |
|---|---|
| सूर्य | 2 |
| चंद्र | 1 |
| मंगल | 5 · 10 |
| बुध | 3 · 12 |
| गुरु | 6 · 9 |
| शुक्र | 4 · 11 |
| शनि | 7 · 8 |
योगकारक ग्रह: मंगल — 5 · 10
कर्क से पंचम और दशम दोनों मंगल के पास हैं — त्रिकोण और केंद्र एक ही ग्रह में, इसलिए मंगल कर्क का योगकारक है। पर वही मंगल इसी राशि में 28 अंश पर नीच भी होता है। बारह राशियों में यह विरोध केवल कर्क को मिला है: जो ग्रह यहाँ सबसे बड़ा योग देता है, उसी का पतन-बिंदु इसी राशि में पड़ता है। शनि के पास सप्तम और अष्टम दोनों हैं।
कर्क में गुरु 5 अंश पर उच्च होता है, और वह बिंदु पुष्य के पहले पाद में पड़ता है — पाद स्वामी शनि। गुरु का शिखर शनि के पाद में: यही कारण है कि पुष्य को शास्त्र सबसे शुभ नक्षत्रों में गिनते हैं और फिर भी उसमें संयम की बात करते हैं। मंगल का नीच बिंदु 28 अंश पर आश्लेषा के चौथे पाद में है, जिसका स्वामी बुध है।
कर्क में पुनर्वसु का केवल एक पाद आता है, इसलिए गुरु की सोलह-वर्षीय महादशा से आरंभ यहाँ दुर्लभ है। शेष आठ पाद बराबर बँटे हैं — पुष्य के चार शनि की उन्नीस वर्ष की दशा देते हैं, आश्लेषा के चार बुध की सत्रह वर्ष की। वृश्चिक और मीन में भी यही तीन।
| नक्षत्र | नक्षत्र स्वामी | गण | योनि | नाड़ी |
|---|---|---|---|---|
| पुनर्वसु | गुरु | देव | मार्जार | आदि |
| पुष्य | शनि | देव | मेष | मध्य |
| आश्लेषा | बुध | राक्षस | मार्जार | अन्त्य |
| ग्रह | स्थिति | राशि में अंश | कौन-से पाद में |
|---|---|---|---|
| गुरु | उच्च | 5°00′ | पुष्य पाद 1 · शनि |
| मंगल | नीच | 28°00′ | आश्लेषा पाद 4 · बुध |
| नक्षत्र | नक्षत्र स्वामी | महादशा वर्ष | राशि का भाग |
|---|---|---|---|
| पुनर्वसु | गुरु | 16 वर्ष | 1/9 · 3°20′ |
| पुष्य | शनि | 19 वर्ष | 4/9 · 13°20′ |
| आश्लेषा | बुध | 17 वर्ष | 4/9 · 13°20′ |
यही तीन आरंभिक महादशाएँ इन राशियों को भी मिलती हैं: वृश्चिक · मीन
चंद्रमा — राशि स्वामी, स्वगृही
चंद्रमा कर्म का कारक नहीं है, इसलिए कर्क चंद्र का काम से संबंध भावनात्मक होता है — जहाँ लोग अच्छे हैं वहाँ प्रदर्शन अच्छा रहता है, और जहाँ वातावरण ठंडा है वहाँ क्षमता के बावजूद गिर जाता है।
सूर्य — कर्क से द्वितीयेश (सिंह)
कर्क से दूसरा भाव सिंह है, सूर्य का। धन का प्रश्न यहाँ प्रतिष्ठा से जुड़ जाता है — खर्च प्रायः वहाँ होता है जहाँ दिखाई देता है, विशेषकर परिवार के सामने। यह लोभ नहीं, स्थान बनाए रखने की चेष्टा है।
शनि — कर्क से सप्तमेश (मकर)
कर्क से सातवाँ भाव मकर है, शनि की राशि। जिस राशि में मन सबसे कोमल है, उसका सप्तम भाव सबसे कठोर ग्रह के हाथ में है — इसलिए कर्क चंद्र के संबंध प्रायः धीमे बनते हैं और बनने पर लंबे चलते हैं।
चंद्रमा और कर्क का वक्ष-स्थान
कालपुरुष में कर्क वक्ष और आमाशय का स्थान है, और चंद्रमा जल तथा पाचन-रस का कारक। कर्क चंद्र में मानसिक दबाव सबसे पहले पेट पर उतरता है — अम्लता, भूख का घटना-बढ़ना। भोजन का समय नियमित रखना इस राशि के लिए विशिष्ट उपाय है।
चंद्रमा। कर्क एकमात्र राशि है जिसका स्वामी चंद्रमा है — सूर्य की तरह चंद्रमा भी केवल एक राशि का स्वामी है, शेष सात ग्रहों को दो-दो राशियाँ मिली हैं।
पुनर्वसु का चौथा पाद, पुष्य के चारों पाद, और आश्लेषा के चारों पाद — कुल नौ। पुष्य पूरा कर्क में ही आता है और उसे शास्त्र में सर्वाधिक शुभ नक्षत्रों में गिना गया है।
चंद्रमा स्वगृही होने से अनुभव बिना छने भीतर जाता है, और वही भावुकता कहलाती है। पर उसका बाहर कितना दिखेगा, यह लग्न और चंद्रमा पर पड़ने वाली दृष्टियों से तय होता है — बहुत से कर्क चंद्र बाहर से शांत दिखते हैं।
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