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धनु राशिफल आज का — चंद्र राशि धनु

धनु राशिफल — 240° से 270° निरयन तक की चंद्र राशि। गुरु स्वामी, द्विस्वभाव अग्नि राशि। मूल, पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा के पाद सहित।

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धनु राशिफल उनके लिए है जिनका चंद्रमा जन्म के समय 240° से 270° निरयन के बीच था। धनु का स्वामी गुरु है और यह द्विस्वभाव अग्नि राशि है। इसमें कोई ग्रह उच्च या नीच का नहीं होता, पर इसका आरंभ मूल नक्षत्र से होता है — गांडांत का वह बिंदु जो पूरे चक्र में केवल तीन जगह बनता है।

राशि स्वामी
गुरु
तत्व
अग्नि
निरयन विस्तार
240°00′ – 270°00′

धनु की सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक बात इसका आरंभ-बिंदु है। वृश्चिक की समाप्ति और धनु का आरंभ जल और अग्नि की संधि है, और शास्त्र इसे गांडांत कहता है — वह जोड़ जहाँ एक तत्व समाप्त होकर दूसरा आरंभ होता है। मूल नक्षत्र इसी संधि पर बैठा है, और उसका स्वामी केतु है। धनु का पहला चरण इसलिए शेष राशि से भिन्न व्यवहार करता है।

धनु द्विस्वभाव राशि है, इसलिए नवांश क्रम पाँचवें स्थान से आरंभ होता है — मेष से। धनु के नौ पाद नवांश में मेष से आरंभ होकर धनु पर समाप्त होते हैं, अग्नि से अग्नि तक। सिंह की तरह धनु को भी पूर्ण अग्नि-वृत्त मिला है, पर अंतर यह कि सिंह स्थिर है और धनु द्विस्वभाव — वही अग्नि यहाँ टिकती नहीं, चलती है।

गुरु का स्वामित्व धनु चंद्र के मन को दिशा देता है, वेग नहीं। गुरु विस्तार और अर्थ का कारक है, इसलिए धनु चंद्र किसी अनुभव को तब तक पूरा नहीं मानता जब तक उसका कोई अर्थ न निकल आए। यही कारण है कि इस राशि के लिए बिना उद्देश्य का काम मेष या सिंह की तुलना में कहीं अधिक थकाने वाला होता है।

इस राशि के नौ पाद — नक्षत्र, अंश और नवांश

नक्षत्र पाद सायन अंश नक्षत्र स्वामी नवांश
मूल1240°00′ – 243°20′केतुमेष
मूल2243°20′ – 246°40′केतुवृषभ
मूल3246°40′ – 250°00′केतुमिथुन
मूल4250°00′ – 253°20′केतुकर्क
पूर्वाषाढ़ा1253°20′ – 256°40′शुक्रसिंह
पूर्वाषाढ़ा2256°40′ – 260°00′शुक्रकन्या
पूर्वाषाढ़ा3260°00′ – 263°20′शुक्रतुला
पूर्वाषाढ़ा4263°20′ – 266°40′शुक्रवृश्चिक
उत्तराषाढ़ा1266°40′ – 270°00′सूर्यधनु

इस राशि से बारह भाव — राशि और भावेश

भाव राशि राशि स्वामी किसका भाव
1धनुगुरुतन, स्वभाव, देह
2मकरशनिधन, कुटुम्ब, वाणी
3कुम्भशनिपराक्रम, भाई-बहन, साहस
4मीनगुरुसुख, माता, घर
5मेषमंगलविद्या, संतान, बुद्धि
6वृषभशुक्ररोग, ऋण, शत्रु
7मिथुनबुधदाम्पत्य, साझेदारी
8कर्कचंद्रआयु, गुप्त, आकस्मिक
9सिंहसूर्यभाग्य, धर्म, पिता
10कन्याबुधकर्म, प्रतिष्ठा
11तुलाशुक्रलाभ, इच्छा-पूर्ति
12वृश्चिकमंगलव्यय, विदेश, मोक्ष

किस ग्रह के पास कौन-से भाव

ग्रहभाव
सूर्य9
चंद्र8
मंगल5 · 12
बुध7 · 10
गुरु1 · 4
शुक्र6 · 11
शनि2 · 3

धनु से लग्न और चतुर्थ दोनों गुरु के पास हैं — स्वभाव और घर एक ही स्वामी के। बुध के पास सप्तम और दशम, यानी साझेदारी और कर्म; शनि के पास द्वितीय और तृतीय। धनु में कोई योगकारक ग्रह नहीं है, क्योंकि गुरु के दोनों भाव — पहला और चौथा — केंद्र-त्रिकोण की वह जोड़ी नहीं बनाते जो योगकारक की परिभाषा माँगती है।

धनु में भी कोई ग्रह अपने उच्च या नीच अंश पर नहीं आता। असर सबसे सीधा गुरु पर पड़ता है, जो यहाँ स्वगृही है पर उच्च नहीं — गुरु का उच्च कर्क में 5 अंश पर है। धनु में बैठे किसी ग्रह के लिए तैयार उत्तर नहीं मिलेगा; बल अवस्था, दृष्टि और नक्षत्र से ही तय होगा।

मूल के चारों पाद धनु में हैं और मूल का स्वामी केतु — विंशोत्तरी की सबसे छोटी दशाओं में से एक, सात वर्ष। पूर्वाषाढ़ा के चार पाद शुक्र की बीस वर्ष की दशा देते हैं, जो सबसे लंबी है; उत्तराषाढ़ा का एक पाद सूर्य की छह वर्ष की। एक ही राशि के भीतर इतना बड़ा अंतर मेष और सिंह को भी मिलता है।

इस राशि के नक्षत्र — गण, योनि और नाड़ी

नक्षत्र नक्षत्र स्वामी गण योनि नाड़ी
मूलकेतुराक्षसश्वानआदि
पूर्वाषाढ़ाशुक्रमनुष्यवानरमध्य
उत्तराषाढ़ासूर्यमनुष्यनकुलअन्त्य

इस राशि में जन्म से कौन-सी महादशा पहले चलती है

नक्षत्र नक्षत्र स्वामी महादशा वर्ष राशि का भाग
मूलकेतु7 वर्ष4/9 · 13°20′
पूर्वाषाढ़ाशुक्र20 वर्ष4/9 · 13°20′
उत्तराषाढ़ासूर्य6 वर्ष1/9 · 3°20′

यही तीन आरंभिक महादशाएँ इन राशियों को भी मिलती हैं: मेष · सिंह

कार्य और करियर

गुरु — राशि स्वामी

गुरु शिक्षा और मार्गदर्शन का कारक है। धनु चंद्र उस काम में खिलता है जिसमें कुछ सिखाना या समझाना हो, और उस काम में सूखता है जो केवल प्रक्रिया हो — यह महत्वाकांक्षा नहीं, गुरु का स्वाभाविक धर्म है।

धन और व्यय

शनि — धनु से द्वितीयेश (मकर)

धनु से दूसरा भाव मकर है, शनि का। सबसे उदार ग्रह की राशि का धन-भाव सबसे संयमी ग्रह के हाथ में है — इसलिए धनु चंद्र की आय प्रायः धीरे बनती है और उदारता तथा बचत के बीच खिंचाव बना रहता है।

संबंध

बुध — धनु से सप्तमेश (मिथुन)

धनु से सातवाँ भाव मिथुन है, बुध की राशि। धनु अर्थ खोजता है और मिथुन सूचना — इसीलिए धनु चंद्र प्रायः उस व्यक्ति की ओर खिंचता है जो उसके बड़े विचारों को व्यावहारिक विवरण में उतार सके।

स्वास्थ्य

गुरु और धनु का ऊरु-स्थान

कालपुरुष में धनु जंघा और यकृत का स्थान है, और गुरु यकृत तथा वसा-चयापचय का कारक। धनु चंद्र में असंयम सबसे पहले यकृत और वज़न पर दिखता है — यह इस राशि का विशिष्ट संकेत है।

यह पृष्ठ आपको क्या नहीं बता सकता

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

धनु राशि में कौन से नक्षत्र आते हैं?

मूल के चारों पाद, पूर्वाषाढ़ा के चारों पाद, और उत्तराषाढ़ा का पहला पाद — कुल नौ। उत्तराषाढ़ा के शेष तीन पाद मकर में चले जाते हैं।

मूल नक्षत्र को अशुभ क्यों कहा जाता है?

मूल वृश्चिक-धनु की गांडांत संधि पर है और उसका स्वामी केतु है, इसलिए परंपरा उसे संक्रमण का नक्षत्र मानती है — अशुभ नहीं, तीव्र। शास्त्र में इसके लिए विशेष शांति बताई गई है, और उसका निर्णय पाद देखे बिना नहीं होता।

क्या धनु राशि वाले स्पष्टवादी होते हैं?

गुरु सत्य और अर्थ का कारक है, इसलिए बात को सीधा कहने की प्रवृत्ति स्वाभाविक है। वह स्पष्टता कठोर लगेगी या मार्गदर्शक, यह गुरु की भाव-स्थिति और उस पर पड़ने वाली दृष्टियों से तय होता है।

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