Your chart. Real guidance. Precise life insights explained like a wise mentor to ask anything, get an honest answer, any hour.
Free plan included forever. Upgrade to Pro when you're ready.
Loved by thousands of users · Watch AskSoma in 60 seconds · See a sample reading and chat with Soma · Begin your free Kundli · Try free tools first · Transparent pricing · Common questions · From birth details to life clarity · Real astronomy + classical Vedic texts + AI · 30+ life insights · 17 AI personas · Multi-chart intelligence · Built for trust
Popular: Free Kundli calculator · Vedic birth chart · Compatibility · Muhurat finder · Today's Panchang · All 89 free tools · 30+ life insights · 17 personas · Pricing · Compare astrology apps
धनु राशिफल — 240° से 270° निरयन तक की चंद्र राशि। गुरु स्वामी, द्विस्वभाव अग्नि राशि। मूल, पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा के पाद सहित।
dhanu rashifal, dhanu rashi, rashifal today
धनु राशिफल उनके लिए है जिनका चंद्रमा जन्म के समय 240° से 270° निरयन के बीच था। धनु का स्वामी गुरु है और यह द्विस्वभाव अग्नि राशि है। इसमें कोई ग्रह उच्च या नीच का नहीं होता, पर इसका आरंभ मूल नक्षत्र से होता है — गांडांत का वह बिंदु जो पूरे चक्र में केवल तीन जगह बनता है।
धनु की सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक बात इसका आरंभ-बिंदु है। वृश्चिक की समाप्ति और धनु का आरंभ जल और अग्नि की संधि है, और शास्त्र इसे गांडांत कहता है — वह जोड़ जहाँ एक तत्व समाप्त होकर दूसरा आरंभ होता है। मूल नक्षत्र इसी संधि पर बैठा है, और उसका स्वामी केतु है। धनु का पहला चरण इसलिए शेष राशि से भिन्न व्यवहार करता है।
धनु द्विस्वभाव राशि है, इसलिए नवांश क्रम पाँचवें स्थान से आरंभ होता है — मेष से। धनु के नौ पाद नवांश में मेष से आरंभ होकर धनु पर समाप्त होते हैं, अग्नि से अग्नि तक। सिंह की तरह धनु को भी पूर्ण अग्नि-वृत्त मिला है, पर अंतर यह कि सिंह स्थिर है और धनु द्विस्वभाव — वही अग्नि यहाँ टिकती नहीं, चलती है।
गुरु का स्वामित्व धनु चंद्र के मन को दिशा देता है, वेग नहीं। गुरु विस्तार और अर्थ का कारक है, इसलिए धनु चंद्र किसी अनुभव को तब तक पूरा नहीं मानता जब तक उसका कोई अर्थ न निकल आए। यही कारण है कि इस राशि के लिए बिना उद्देश्य का काम मेष या सिंह की तुलना में कहीं अधिक थकाने वाला होता है।
| नक्षत्र | पाद | सायन अंश | नक्षत्र स्वामी | नवांश |
|---|---|---|---|---|
| मूल | 1 | 240°00′ – 243°20′ | केतु | मेष |
| मूल | 2 | 243°20′ – 246°40′ | केतु | वृषभ |
| मूल | 3 | 246°40′ – 250°00′ | केतु | मिथुन |
| मूल | 4 | 250°00′ – 253°20′ | केतु | कर्क |
| पूर्वाषाढ़ा | 1 | 253°20′ – 256°40′ | शुक्र | सिंह |
| पूर्वाषाढ़ा | 2 | 256°40′ – 260°00′ | शुक्र | कन्या |
| पूर्वाषाढ़ा | 3 | 260°00′ – 263°20′ | शुक्र | तुला |
| पूर्वाषाढ़ा | 4 | 263°20′ – 266°40′ | शुक्र | वृश्चिक |
| उत्तराषाढ़ा | 1 | 266°40′ – 270°00′ | सूर्य | धनु |
| भाव | राशि | राशि स्वामी | किसका भाव |
|---|---|---|---|
| 1 | धनु | गुरु | तन, स्वभाव, देह |
| 2 | मकर | शनि | धन, कुटुम्ब, वाणी |
| 3 | कुम्भ | शनि | पराक्रम, भाई-बहन, साहस |
| 4 | मीन | गुरु | सुख, माता, घर |
| 5 | मेष | मंगल | विद्या, संतान, बुद्धि |
| 6 | वृषभ | शुक्र | रोग, ऋण, शत्रु |
| 7 | मिथुन | बुध | दाम्पत्य, साझेदारी |
| 8 | कर्क | चंद्र | आयु, गुप्त, आकस्मिक |
| 9 | सिंह | सूर्य | भाग्य, धर्म, पिता |
| 10 | कन्या | बुध | कर्म, प्रतिष्ठा |
| 11 | तुला | शुक्र | लाभ, इच्छा-पूर्ति |
| 12 | वृश्चिक | मंगल | व्यय, विदेश, मोक्ष |
| ग्रह | भाव |
|---|---|
| सूर्य | 9 |
| चंद्र | 8 |
| मंगल | 5 · 12 |
| बुध | 7 · 10 |
| गुरु | 1 · 4 |
| शुक्र | 6 · 11 |
| शनि | 2 · 3 |
धनु से लग्न और चतुर्थ दोनों गुरु के पास हैं — स्वभाव और घर एक ही स्वामी के। बुध के पास सप्तम और दशम, यानी साझेदारी और कर्म; शनि के पास द्वितीय और तृतीय। धनु में कोई योगकारक ग्रह नहीं है, क्योंकि गुरु के दोनों भाव — पहला और चौथा — केंद्र-त्रिकोण की वह जोड़ी नहीं बनाते जो योगकारक की परिभाषा माँगती है।
धनु में भी कोई ग्रह अपने उच्च या नीच अंश पर नहीं आता। असर सबसे सीधा गुरु पर पड़ता है, जो यहाँ स्वगृही है पर उच्च नहीं — गुरु का उच्च कर्क में 5 अंश पर है। धनु में बैठे किसी ग्रह के लिए तैयार उत्तर नहीं मिलेगा; बल अवस्था, दृष्टि और नक्षत्र से ही तय होगा।
मूल के चारों पाद धनु में हैं और मूल का स्वामी केतु — विंशोत्तरी की सबसे छोटी दशाओं में से एक, सात वर्ष। पूर्वाषाढ़ा के चार पाद शुक्र की बीस वर्ष की दशा देते हैं, जो सबसे लंबी है; उत्तराषाढ़ा का एक पाद सूर्य की छह वर्ष की। एक ही राशि के भीतर इतना बड़ा अंतर मेष और सिंह को भी मिलता है।
| नक्षत्र | नक्षत्र स्वामी | गण | योनि | नाड़ी |
|---|---|---|---|---|
| मूल | केतु | राक्षस | श्वान | आदि |
| पूर्वाषाढ़ा | शुक्र | मनुष्य | वानर | मध्य |
| उत्तराषाढ़ा | सूर्य | मनुष्य | नकुल | अन्त्य |
| नक्षत्र | नक्षत्र स्वामी | महादशा वर्ष | राशि का भाग |
|---|---|---|---|
| मूल | केतु | 7 वर्ष | 4/9 · 13°20′ |
| पूर्वाषाढ़ा | शुक्र | 20 वर्ष | 4/9 · 13°20′ |
| उत्तराषाढ़ा | सूर्य | 6 वर्ष | 1/9 · 3°20′ |
यही तीन आरंभिक महादशाएँ इन राशियों को भी मिलती हैं: मेष · सिंह
गुरु — राशि स्वामी
गुरु शिक्षा और मार्गदर्शन का कारक है। धनु चंद्र उस काम में खिलता है जिसमें कुछ सिखाना या समझाना हो, और उस काम में सूखता है जो केवल प्रक्रिया हो — यह महत्वाकांक्षा नहीं, गुरु का स्वाभाविक धर्म है।
शनि — धनु से द्वितीयेश (मकर)
धनु से दूसरा भाव मकर है, शनि का। सबसे उदार ग्रह की राशि का धन-भाव सबसे संयमी ग्रह के हाथ में है — इसलिए धनु चंद्र की आय प्रायः धीरे बनती है और उदारता तथा बचत के बीच खिंचाव बना रहता है।
बुध — धनु से सप्तमेश (मिथुन)
धनु से सातवाँ भाव मिथुन है, बुध की राशि। धनु अर्थ खोजता है और मिथुन सूचना — इसीलिए धनु चंद्र प्रायः उस व्यक्ति की ओर खिंचता है जो उसके बड़े विचारों को व्यावहारिक विवरण में उतार सके।
गुरु और धनु का ऊरु-स्थान
कालपुरुष में धनु जंघा और यकृत का स्थान है, और गुरु यकृत तथा वसा-चयापचय का कारक। धनु चंद्र में असंयम सबसे पहले यकृत और वज़न पर दिखता है — यह इस राशि का विशिष्ट संकेत है।
मूल के चारों पाद, पूर्वाषाढ़ा के चारों पाद, और उत्तराषाढ़ा का पहला पाद — कुल नौ। उत्तराषाढ़ा के शेष तीन पाद मकर में चले जाते हैं।
मूल वृश्चिक-धनु की गांडांत संधि पर है और उसका स्वामी केतु है, इसलिए परंपरा उसे संक्रमण का नक्षत्र मानती है — अशुभ नहीं, तीव्र। शास्त्र में इसके लिए विशेष शांति बताई गई है, और उसका निर्णय पाद देखे बिना नहीं होता।
गुरु सत्य और अर्थ का कारक है, इसलिए बात को सीधा कहने की प्रवृत्ति स्वाभाविक है। वह स्पष्टता कठोर लगेगी या मार्गदर्शक, यह गुरु की भाव-स्थिति और उस पर पड़ने वाली दृष्टियों से तय होता है।
अपनी राशि नहीं — अपनी कुंडली देखिए
गणना स्विस एफेमेरिस और लाहिड़ी अयनांश से · समीक्षा तिथि 2026-08-07