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सिंह राशिफल — 120° से 150° निरयन तक की चंद्र राशि। सूर्य स्वामी, स्थिर अग्नि राशि। मघा, पूर्वा फाल्गुनी और उत्तरा फाल्गुनी के पाद सहित।
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सिंह राशिफल उनके लिए है जिनका चंद्रमा जन्म के समय 120° से 150° निरयन के बीच था। सिंह का स्वामी सूर्य है और यह एकमात्र राशि है जिस पर सूर्य का स्वामित्व है — इसमें कोई ग्रह उच्च या नीच का नहीं होता, इसलिए इसका स्वभाव पूरी तरह सूर्य से पढ़ा जाता है।
सिंह की व्याख्या में सबसे बड़ी भूल यह होती है कि इसे प्रदर्शन से जोड़ दिया जाता है। सूर्य आत्मा का कारक है, दिखावे का नहीं। सिंह चंद्र का मन जिस चीज़ को सबसे अधिक खोजता है वह ध्यान नहीं, अर्थवत्ता है — यह अनुभव कि जो कर रहा हूँ उसका कोई मूल्य है। ध्यान उसका उपोत्पाद है, लक्ष्य नहीं।
सिंह स्थिर राशि है, इसलिए नवांश क्रम नवें स्थान से आरंभ होता है — मेष से। सिंह के नौ पाद नवांश में मेष से आरंभ होकर धनु पर समाप्त होते हैं, अर्थात् अग्नि से आरंभ और अग्नि पर अंत। यह पूर्ण अग्नि-वृत्त सिंह की स्थिरता को समझने की कुंजी है: यह वह स्थिरता है जो जलती रहती है, बैठी नहीं रहती।
सिंह में मघा पूरी आती है और उसका स्वामी केतु है। सिंह के पहले चार पाद ऐसे हैं जहाँ राशि-स्वामी सूर्य और नक्षत्र-स्वामी केतु है — आत्मा का कारक और मोक्ष का कारक एक साथ। शास्त्र में मघा को पितरों का नक्षत्र कहा गया है, और यह संयोजन सिंह के अतिरिक्त कहीं नहीं बनता।
| नक्षत्र | पाद | सायन अंश | नक्षत्र स्वामी | नवांश |
|---|---|---|---|---|
| मघा | 1 | 120°00′ – 123°20′ | केतु | मेष |
| मघा | 2 | 123°20′ – 126°40′ | केतु | वृषभ |
| मघा | 3 | 126°40′ – 130°00′ | केतु | मिथुन |
| मघा | 4 | 130°00′ – 133°20′ | केतु | कर्क |
| पूर्वा फाल्गुनी | 1 | 133°20′ – 136°40′ | शुक्र | सिंह |
| पूर्वा फाल्गुनी | 2 | 136°40′ – 140°00′ | शुक्र | कन्या |
| पूर्वा फाल्गुनी | 3 | 140°00′ – 143°20′ | शुक्र | तुला |
| पूर्वा फाल्गुनी | 4 | 143°20′ – 146°40′ | शुक्र | वृश्चिक |
| उत्तरा फाल्गुनी | 1 | 146°40′ – 150°00′ | सूर्य | धनु |
| भाव | राशि | राशि स्वामी | किसका भाव |
|---|---|---|---|
| 1 | सिंह | सूर्य | तन, स्वभाव, देह |
| 2 | कन्या | बुध | धन, कुटुम्ब, वाणी |
| 3 | तुला | शुक्र | पराक्रम, भाई-बहन, साहस |
| 4 | वृश्चिक | मंगल | सुख, माता, घर |
| 5 | धनु | गुरु | विद्या, संतान, बुद्धि |
| 6 | मकर | शनि | रोग, ऋण, शत्रु |
| 7 | कुम्भ | शनि | दाम्पत्य, साझेदारी |
| 8 | मीन | गुरु | आयु, गुप्त, आकस्मिक |
| 9 | मेष | मंगल | भाग्य, धर्म, पिता |
| 10 | वृषभ | शुक्र | कर्म, प्रतिष्ठा |
| 11 | मिथुन | बुध | लाभ, इच्छा-पूर्ति |
| 12 | कर्क | चंद्र | व्यय, विदेश, मोक्ष |
| ग्रह | भाव |
|---|---|
| सूर्य | 1 |
| चंद्र | 12 |
| मंगल | 4 · 9 |
| बुध | 2 · 11 |
| गुरु | 5 · 8 |
| शुक्र | 3 · 10 |
| शनि | 6 · 7 |
योगकारक ग्रह: मंगल — 4 · 9
सिंह से चतुर्थ और नवम दोनों मंगल के पास हैं — एक केंद्र, एक त्रिकोण — इसलिए मंगल सिंह का योगकारक है। शुक्र के पास तृतीय और दशम, यानी पराक्रम और प्रतिष्ठा एक ही स्वामी के। शनि के पास षष्ठ और सप्तम दोनों हैं: सिंह चंद्र के लिए साझेदारी और शत्रुता एक ही ग्रह के अधीन आती हैं, और यही इस राशि की सबसे बार दोहराई जाने वाली उलझन है।
सूर्य सिंह में स्वगृही है, पर उच्च नहीं — उसका उच्च मेष में 10 अंश पर है, और सिंह में किसी भी ग्रह का उच्च या नीच बिंदु नहीं पड़ता। यही कारण है कि सिंह चंद्र में सूर्य की स्थिति "बलवान" या "निर्बल" जैसे तैयार शब्दों से नहीं, भाव और दृष्टि से पढ़ी जाती है।
सिंह के नौ पादों में सबसे भारी हिस्सा शुक्र का है: पूर्वा फाल्गुनी के चारों पाद बीस वर्ष की महादशा देते हैं। मघा के चार पाद केतु की सात-वर्षीय दशा से आरंभ कराते हैं, और उत्तरा फाल्गुनी का एक अकेला पाद सूर्य की छह-वर्षीय से। मेष और धनु का क्रम भी ऐसा ही है।
| नक्षत्र | नक्षत्र स्वामी | गण | योनि | नाड़ी |
|---|---|---|---|---|
| मघा | केतु | राक्षस | मूषक | अन्त्य |
| पूर्वा फाल्गुनी | शुक्र | मनुष्य | मूषक | मध्य |
| उत्तरा फाल्गुनी | सूर्य | मनुष्य | गौ | आदि |
| नक्षत्र | नक्षत्र स्वामी | महादशा वर्ष | राशि का भाग |
|---|---|---|---|
| मघा | केतु | 7 वर्ष | 4/9 · 13°20′ |
| पूर्वा फाल्गुनी | शुक्र | 20 वर्ष | 4/9 · 13°20′ |
| उत्तरा फाल्गुनी | सूर्य | 6 वर्ष | 1/9 · 3°20′ |
यही तीन आरंभिक महादशाएँ इन राशियों को भी मिलती हैं: मेष · धनु
सूर्य — राशि स्वामी
सूर्य अधिकार का कारक है। सिंह चंद्र उस काम में खिलता है जहाँ उत्तरदायित्व उसका अपना हो, और उस काम में मुरझाता है जहाँ उसका नाम कहीं दर्ज न हो — यह अहंकार नहीं, सूर्य का स्वाभाविक धर्म है।
बुध — सिंह से द्वितीयेश (कन्या)
सिंह से दूसरा भाव कन्या है, बुध का — और बुध वहाँ उच्च का भी है। अर्थात् सिंह चंद्र के धन-भाव पर सबसे विश्लेषणात्मक ग्रह बैठा है। आय अच्छी बनती है; कठिनाई तब आती है जब उदारता हिसाब से आगे निकल जाए।
शनि — सिंह से सप्तमेश (कुम्भ)
सिंह से सातवाँ भाव कुम्भ है, शनि की राशि। सूर्य और शनि परस्पर विरोधी माने गए हैं, और यह विरोध सिंह चंद्र के संबंधों की मूल संरचना है — आकर्षण प्रायः उस व्यक्ति की ओर होता है जो प्रभावित नहीं होता।
सूर्य और सिंह का हृदय-स्थान
कालपुरुष में सिंह हृदय का स्थान है और सूर्य प्राण-शक्ति का कारक। सिंह चंद्र में थकान धीरे-धीरे नहीं आती, एक साथ आती है — विश्राम को कार्य-सूची में स्थान देना इस राशि के लिए विशिष्ट परामर्श है, सामान्य नहीं।
मघा के चारों पाद, पूर्वा फाल्गुनी के चारों पाद, और उत्तरा फाल्गुनी का पहला पाद — कुल नौ। उत्तरा फाल्गुनी के शेष तीन पाद कन्या में चले जाते हैं।
सूर्य आत्मा का कारक है, प्रदर्शन का नहीं। जिसे ध्यान की भूख कहा जाता है वह प्रायः अर्थवत्ता की खोज है। यह किस रूप में प्रकट होगी, यह सूर्य की भाव-स्थिति से तय होता है, केवल राशि से नहीं।
नहीं। उत्तरा फाल्गुनी का पहला पाद सिंह में है और शेष तीन कन्या में। राशि-स्वामी बदलने से — सिंह में सूर्य, कन्या में बुध — एक ही नक्षत्र का फल भिन्न हो जाता है।
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