Your chart. Real guidance. Precise life insights explained like a wise mentor to ask anything, get an honest answer, any hour.
Free plan included forever. Upgrade to Pro when you're ready.
Loved by thousands of users · Watch AskSoma in 60 seconds · See a sample reading and chat with Soma · Begin your free Kundli · Try free tools first · Transparent pricing · Common questions · From birth details to life clarity · Real astronomy + classical Vedic texts + AI · 30+ life insights · 17 AI personas · Multi-chart intelligence · Built for trust
Popular: Free Kundli calculator · Vedic birth chart · Compatibility · Muhurat finder · Today's Panchang · All 89 free tools · 30+ life insights · 17 personas · Pricing · Compare astrology apps
कुम्भ राशिफल — 300° से 330° निरयन तक की चंद्र राशि। शनि स्वामी, स्थिर वायु राशि। धनिष्ठा, शतभिषा और पूर्व भाद्रपद के पाद सहित।
kumbh rashifal, kumbh rashi, rashifal today
कुम्भ राशिफल उनके लिए है जिनका चंद्रमा जन्म के समय 300° से 330° निरयन के बीच था। कुम्भ का स्वामी शनि है और यह स्थिर वायु राशि है — शनि की दो राशियों में यही वह है जो पृथ्वी की नहीं, वायु की है, और यही अंतर पूरी व्याख्या बदल देता है।
मकर और कुम्भ दोनों का स्वामी शनि है, पर मकर में शनि पदार्थ पर काम करता है और कुम्भ में विचार पर। इसलिए कुम्भ चंद्र का अनुशासन समय और श्रम का नहीं, दृष्टिकोण का होता है — एक बार कोई बात समझ में बैठ गई तो वह सहज नहीं हिलती। स्थिर राशि होना इस दृढ़ता को और बढ़ा देता है।
कुम्भ स्थिर राशि है, इसलिए नवांश क्रम नवें स्थान से आरंभ होता है — तुला से। कुम्भ के नौ पाद नवांश में तुला से आरंभ होकर मिथुन पर समाप्त होते हैं, वायु से वायु तक। तुला के वायु-वृत्त की तरह यह भी पूर्ण वायु-वृत्त है, पर अंतर यह कि तुला चर है और कुम्भ स्थिर — यहाँ विचार बदलता नहीं, गहरा होता है।
कुम्भ में शतभिषा पूरी आती है और उसका स्वामी राहु है। शनि की राशि में राहु का नक्षत्र — शास्त्र में दोनों को छाया और सीमा से जोड़ा गया है, और शतभिषा को "सौ वैद्य" का नक्षत्र कहा गया है। कुम्भ के मध्य चार पादों पर बनने वाला यह शनि-राहु संयोजन किसी अन्य राशि में इस रूप में नहीं आता, और यही कुम्भ की उस प्रवृत्ति का आधार है जो भीड़ से अलग खड़ी रहती है।
| नक्षत्र | पाद | सायन अंश | नक्षत्र स्वामी | नवांश |
|---|---|---|---|---|
| धनिष्ठा | 3 | 300°00′ – 303°20′ | मंगल | तुला |
| धनिष्ठा | 4 | 303°20′ – 306°40′ | मंगल | वृश्चिक |
| शतभिषा | 1 | 306°40′ – 310°00′ | राहु | धनु |
| शतभिषा | 2 | 310°00′ – 313°20′ | राहु | मकर |
| शतभिषा | 3 | 313°20′ – 316°40′ | राहु | कुम्भ |
| शतभिषा | 4 | 316°40′ – 320°00′ | राहु | मीन |
| पूर्व भाद्रपद | 1 | 320°00′ – 323°20′ | गुरु | मेष |
| पूर्व भाद्रपद | 2 | 323°20′ – 326°40′ | गुरु | वृषभ |
| पूर्व भाद्रपद | 3 | 326°40′ – 330°00′ | गुरु | मिथुन |
| भाव | राशि | राशि स्वामी | किसका भाव |
|---|---|---|---|
| 1 | कुम्भ | शनि | तन, स्वभाव, देह |
| 2 | मीन | गुरु | धन, कुटुम्ब, वाणी |
| 3 | मेष | मंगल | पराक्रम, भाई-बहन, साहस |
| 4 | वृषभ | शुक्र | सुख, माता, घर |
| 5 | मिथुन | बुध | विद्या, संतान, बुद्धि |
| 6 | कर्क | चंद्र | रोग, ऋण, शत्रु |
| 7 | सिंह | सूर्य | दाम्पत्य, साझेदारी |
| 8 | कन्या | बुध | आयु, गुप्त, आकस्मिक |
| 9 | तुला | शुक्र | भाग्य, धर्म, पिता |
| 10 | वृश्चिक | मंगल | कर्म, प्रतिष्ठा |
| 11 | धनु | गुरु | लाभ, इच्छा-पूर्ति |
| 12 | मकर | शनि | व्यय, विदेश, मोक्ष |
| ग्रह | भाव |
|---|---|
| सूर्य | 7 |
| चंद्र | 6 |
| मंगल | 3 · 10 |
| बुध | 5 · 8 |
| गुरु | 2 · 11 |
| शुक्र | 4 · 9 |
| शनि | 1 · 12 |
योगकारक ग्रह: शुक्र — 4 · 9
कुंभ से चतुर्थ और नवम दोनों शुक्र के पास हैं — केंद्र और त्रिकोण — इसलिए शुक्र कुंभ का योगकारक है। शनि स्वयं लग्न और व्यय भाव दोनों का स्वामी है: कुंभ चंद्र के लिए स्वभाव और त्याग एक ही ग्रह से पढ़े जाते हैं। बुध के पास पंचम और अष्टम।
कुंभ में किसी ग्रह का उच्च या नीच अंश नहीं है। शनि यहाँ स्वगृही है, पर उसका उच्च तुला में 20 अंश पर पड़ता है — और तुला कुंभ से नवम भाव है, यानी शनि का शिखर कुंभ चंद्र के भाग्य-भाव में बैठता है। राशि से नहीं, भाव और नक्षत्र से ही यहाँ शनि का बल निकलता है।
शतभिषा के चारों पाद कुंभ में हैं और उसका स्वामी राहु है, इसलिए अठारह वर्ष की महादशा यहाँ का सबसे आम आरंभ बनती है। पूर्व भाद्रपद के तीन पाद गुरु (16 वर्ष) और धनिष्ठा के दो मंगल (7 वर्ष) देते हैं। मिथुन और तुला में भी यही तीन स्वामी हैं।
| नक्षत्र | नक्षत्र स्वामी | गण | योनि | नाड़ी |
|---|---|---|---|---|
| धनिष्ठा | मंगल | राक्षस | सिंह | मध्य |
| शतभिषा | राहु | राक्षस | अश्व | आदि |
| पूर्व भाद्रपद | गुरु | मनुष्य | सिंह | आदि |
| नक्षत्र | नक्षत्र स्वामी | महादशा वर्ष | राशि का भाग |
|---|---|---|---|
| धनिष्ठा | मंगल | 7 वर्ष | 2/9 · 6°40′ |
| शतभिषा | राहु | 18 वर्ष | 4/9 · 13°20′ |
| पूर्व भाद्रपद | गुरु | 16 वर्ष | 3/9 · 10°00′ |
यही तीन आरंभिक महादशाएँ इन राशियों को भी मिलती हैं: मिथुन · तुला
शनि — राशि स्वामी, वायु राशि में
कुम्भ चंद्र उस काम में सर्वोत्तम है जहाँ व्यवस्था बनानी हो — नियम, ढाँचा, प्रणाली — और उस काम में अटकता है जहाँ केवल आदेश का पालन करना हो। शनि यहाँ अनुशासन देता है, आज्ञाकारिता नहीं।
गुरु — कुम्भ से द्वितीयेश (मीन)
कुम्भ से दूसरा भाव मीन है, गुरु का। धन-भाव पर सबसे उदार ग्रह होने से आय के स्रोत प्रायः अपेक्षित मार्ग से नहीं आते; कठिनाई कमाने की नहीं, अनियमित आय को व्यवस्थित रखने की होती है।
सूर्य — कुम्भ से सप्तमेश (सिंह)
कुम्भ से सातवाँ भाव सिंह है, सूर्य की राशि। शनि और सूर्य की परस्पर विरोधी प्रकृति संबंधों की मूल संरचना बनाती है — कुम्भ चंद्र दूरी बनाकर चलता है, पर खिंचाव प्रायः उस व्यक्ति की ओर होता है जो गर्मजोशी से भरा हो।
शनि और कुम्भ का जंघा-स्थान
कालपुरुष में कुम्भ पिंडली, टखने और रक्त-संचार का स्थान है। कुम्भ चंद्र में तनाव पिंडलियों और रक्त-संचार पर उतरता है — लंबे समय तक एक ही मुद्रा में बैठना इस राशि के लिए विशेष रूप से भारी पड़ता है।
शास्त्रीय स्वामी शनि है। कुछ परंपराएँ राहु को कुम्भ का सह-स्वामी मानती हैं, जैसे वृश्चिक के लिए केतु को — पर पराशर पद्धति की मूल गणना शनि से चलती है।
धनिष्ठा के तीसरे और चौथे पाद, शतभिषा के चारों पाद, और पूर्व भाद्रपद के पहले तीन पाद — कुल नौ। पूर्व भाद्रपद का चौथा पाद मीन में जाता है।
तत्व का अंतर है। मकर पृथ्वी तत्व की चर राशि है, कुम्भ वायु तत्व की स्थिर। मकर में शनि ठोस परिणाम पर काम करता है, कुम्भ में विचार और व्यवस्था पर — इसलिए एक ही स्वामी होने पर भी दोनों का स्वभाव भिन्न है।
अपनी राशि नहीं — अपनी कुंडली देखिए
गणना स्विस एफेमेरिस और लाहिड़ी अयनांश से · समीक्षा तिथि 2026-08-07