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पंचांग के पाँच अंग — तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण — और हर अंग किस गणना से निकलता है। तिथि 12 अंश, नक्षत्र 13°20′, करण आधी तिथि। लाहिड़ी अयनांश पर आधारित।
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पंचांग का अर्थ ही है पाँच अंग — तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इनमें से चार गणितीय हैं: तिथि चंद्र और सूर्य के बीच 12 अंश की दूरी है, नक्षत्र 13°20′ का, योग भी 13°20′ का, और करण आधी तिथि यानी 6 अंश का।
पंचांग को प्रायः "आज के शुभ-अशुभ समय की सूची" समझा जाता है, पर वह उसका परिणाम है, परिभाषा नहीं। परिभाषा यह है कि पाँच अंगों में से हर एक आकाश की एक निश्चित माप है, और वे मापें रोज़ बदलती हैं क्योंकि चंद्रमा और सूर्य चलते रहते हैं। इसीलिए एक ही तारीख का पंचांग अलग-अलग शहरों में थोड़ा अलग होता है — सूर्योदय बदलता है।
सबसे अधिक भ्रम योग को लेकर होता है। तिथि चंद्रमा और सूर्य के अंतर से निकलती है, पर योग दोनों के योग से — अर्थात् उनकी स्थितियाँ जोड़ी जाती हैं, घटाई नहीं। यही कारण है कि तिथि और योग एक साथ नहीं बदलते, और यही वह बिंदु है जहाँ अधिकांश लोकप्रिय लेखन गलती करता है।
करण सबसे सरल है और सबसे कम समझा जाता है: वह आधी तिथि है। एक तिथि 12 अंश की है, तो करण 6 अंश का, और इसीलिए एक तिथि में ठीक दो करण आते हैं। तीस तिथियों के साठ करण-स्थान बनते हैं, जिन्हें ग्यारह नामों से भरा जाता है — चार स्थिर और सात चर, जो बार-बार दोहराए जाते हैं।
| अंग | विस्तार | कुल संख्या | किससे निकलता है |
|---|---|---|---|
| तिथि | 12° | 30 | तिथि — चंद्रमा और सूर्य के बीच की कोणीय दूरी, हर 12 अंश पर एक। पूरे चक्र में तीस तिथियाँ बनती हैं, पंद्रह शुक्ल पक्ष की और पंद्रह कृष्ण पक्ष की। |
| वार | — | 7 | वार — सूर्योदय से सूर्योदय तक का दिन। यह एकमात्र अंग है जो अंश से नहीं, समय से गिना जाता है; इसीलिए आधी रात को वार नहीं बदलता। |
| नक्षत्र | 13°20′ | 27 | नक्षत्र — चंद्रमा जिस 13°20′ के खंड में है। सत्ताईस नक्षत्र पूरे 360 अंश को भरते हैं। |
| योग | 13°20′ | 27 | योग — चंद्रमा और सूर्य की स्थितियों का योग, हर 13°20′ पर एक। सत्ताईस योग होते हैं। ध्यान रहे: यहाँ जोड़ है, अंतर नहीं। |
| करण | 6° | 60 | करण — आधी तिथि, अर्थात् 6 अंश। एक तिथि में दो करण; तीस तिथियों में साठ करण-स्थान, जो ग्यारह नामों से भरे जाते हैं। |
वार अंश से नहीं, सूर्योदय से गिना जाता है
शुक्ल पक्ष · कृष्ण पक्ष
तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। "पंचांग" शब्द का अर्थ ही "पाँच अंग" है। इनमें से चार आकाशीय अंश से निकलते हैं और केवल वार समय से — सूर्योदय से सूर्योदय तक।
चंद्रमा और सूर्य के बीच की कोणीय दूरी से। हर 12 अंश की दूरी पर एक तिथि पूरी होती है, इसलिए पूरे 360 अंश में तीस तिथियाँ बनती हैं — पंद्रह शुक्ल पक्ष की और पंद्रह कृष्ण पक्ष की।
तिथि चंद्रमा और सूर्य के अंतर से निकलती है, योग दोनों के जोड़ से। इसीलिए ये एक साथ नहीं बदलते। योग सत्ताईस हैं और हर एक 13°20′ का है।
चंद्रमा की गति असमान होने से तिथि की लंबाई बदलती रहती है। यदि कोई तिथि सूर्योदय से सूर्योदय के बीच पूरी हो जाए तो वह किसी दिन की तिथि नहीं बनती — यह क्षय है। यदि दो सूर्योदय तक चले तो वृद्धि।
गणना स्विस एफेमेरिस और लाहिड़ी अयनांश से · समीक्षा तिथि 2026-08-07
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